१. हीन भावना के शिकार हैं शिक्षक

शिक्षा का पतन -१

😢😢 नियोजित शिक्षक क्यों है हीन भावना के शिकार 😢😢

शिक्षक दिवस के दिन पटना के कृष्ण मेमोरियल हॉल में बिहार के शिक्षकों के सम्मान में आयोजित समारोह में बिहार के माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने बहुत सुंदर बात कही थी - *"कहां थे और कहां आ गए।"*
बिहार के सुशासन बाबू के रूप में प्रसिद्ध श्री नीतीश कुमार से एक सवाल हर एक बुद्धिजीवी जरूर पूछना चाहेगा कि *"क्या बिहार के सरकारी विद्यालय के शिक्षकों को वहां होना चाहिए था जहां वे लोग थे और क्या वे लोग वहां पहुंच गए जहां उनका वाजिब हक है ?"*

इस बात में कोई शक नहीं है कि वक्त के साथ और नितीश बाबू के रहमों करम से बिहार के नियोजित शिक्षकों की स्थिति में लगातार सुधार हुआ है। 1500 की मामूली तनख्वाह पर नियोजित होने वाले शिक्षक आज इनकम टैक्स फाइल करने वाले लोगों के फेहरिस्त में आ गए हैं। आपकी कृपा से निश्चित रूप से इनकी स्थिति आने वाले समय में और भी बेहतर होगी और उन्हें अन्य भी कई सुविधाएं आपके द्वारा निश्चित रूप से उपलब्ध करवाया जाएगा। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर नियोजित शिक्षक हीन भावना के शिकार क्यों हो गए और बिहार के सरकारी विद्यालयों की शिक्षा स्थिति इतनी बद से बदतर क्यों हो गई ? *दरअसल नियोजित शिक्षकों के स्थिति में दिन-ब-दिन सुधार का सबसे बड़ा कारण उनका लगातार आंदोलनात्मक रवैया रहा है। सरकार और नीति नियंताओं ने कभी भी स्वेच्छा से उनकी सुध लेने का प्रयास नहीं किया है।* शिक्षकों के जिस ऊर्जा का उपयोग देश के भविष्य और नई पीढ़ी की पौध को सींचने और संवारने में होना चाहिए था उसका बहुत बड़ा हिस्सा हर साल आंदोलन और संघ संगठन खड़ा करने में व्यर्थ हो जाता है। पिछले कुछ समय में संघ संगठनों की बाढ़ आ गई है और शिक्षकों में अपने ज्ञान का दान कर समाज में विशिष्ट छवि बनाने की जगह नेता बनने की प्रवृत्ति घर कर गई है। *सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि कुछ शिक्षक नेताओं में शिक्षकों के मासिक वेतन भुगतान का श्रेय लेने का होड़ लगा हुआ है।* अल्प और त्योहारी वेतन शिक्षक नेताओं की कृपा से अगर शिक्षकों के खाते में जाए तो यह सवाल भी उठना लाजमी है कि सरकार और सरकारी मुलाजिम क्या कर रहे हैं। अगर शिक्षकों का भुगतान भी कथित शिक्षक नेताओं के प्रयास के कारण हो रहा है ऐसे में सरकार और सरकारी नीति नियंता शिक्षकों के सुख सुविधाओं के प्रति कितना चिंतित हैं यह बेहतर समझा जा सकता है।

*जिस समाज में शिक्षकों के वेतन भुगतान (जिसका सीधा संबंध शिक्षक और शिक्षकों के परिवार की रोटी, कपड़ा, दवाई और अन्य जरूरी समानो से सीधा जुड़ा है) के प्रति भी सरकार और शिक्षा विभाग के पदाधिकारी संवेदनशील नहीं है, वह समाज शिक्षकों से बच्चों के प्रति संवेदनशील और समर्पित होने की अपेक्षा कैसे रख सकते है ?* शिक्षक एक बुद्धिजीवियों की जमात है जो लगातार अपनी प्रोन्नति और सुंदर भविष्य के प्रति चिंतित रहता है लेकिन सरकारी नीति नियंताओं ने एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण कर दिया है जहां शिक्षकों को प्रोन्नति और विकास का कोई भी अवसर प्राप्त नहीं है। 10 वर्षों से शिक्षक अपने ट्रांसफर और घर के आस-पास अपने पोस्टिंग की बाट जो रहे हैं लेकिन सरकार और सरकारी सिस्टम इसके प्रति बिल्कुल भी संवेदनशील नहीं है। अपने भविष्य और दैनिक समस्याओं से परेशान एक आम शिक्षक अपने कर्तव्यों से विमुख हो चुका है लेकिन इसी सरकारी विद्यालय में हमारे बीच कुछ ऐसे ईश्वर का विशेष आशीर्वाद प्राप्त शिक्षक हैं जिन्हें सरकार द्वारा न सिर्फ मोटी तनख्वाह उपलब्ध कराई जाती है बल्कि उनकी सुख-सुविधाओं का विशेष ख्याल रखा जाता है। इसे सरकारी मुलाजिम नियमित शिक्षक कहते हैं। सरकार और सरकार की नीति-निर्धारकों को यह जवाब देना चाहिए कि आखिर कौन सा ऐसा कार्य है जो नियमित शिक्षक करते हैं और नियोजित शिक्षक करने में सक्षम नहीं है अथवा उनसे यह कार्य नहीं लिया जाता है ? भारतीय लोकतंत्र में पिछले कुछ समय से एक नई परिपाटी चलन में आई है जहां सवाल करने वाले को देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है। एक बुद्धिजीवी समाज लगातार प्रश्न करता है और उन्हें बहुत ज्यादा समय तक दबाया नहीं जा सकता है। *बिहार के अधिकांश सरकारी विद्यालयों के शिक्षक हीनभावना के शिकार हो चुके हैं। उनकी यही हीन भावना उन्हें कर्तव्यों से विमुख कर रही है।* सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा रखने वाली सरकार शिक्षकों से उपेक्षापूर्ण व्यवहार कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में कभी भी सफल नहीं हो सकती है। बिहार के गरीब बच्चे को विद्यालय में भरपेट भोजन मिलना जरूरी है। छात्रवृत्ति पोशाक और किताबें भी मिलने से निश्चित रूप से उनके लिए शिक्षा ग्रहण करना आसान हो जाएगा लेकिन *लाख टके का सवाल यह है कि अगर शिक्षक ही अपनी उलझनों में उलझ कर शिक्षा दान के कर्तव्य से विमुख हो जाएंगे तब इन गरीब बच्चों का भला कैसे हो पाएगा।* सरकार या तो समस्या समझना नहीं चाह रही है अथवा समझ कर भी समझना नहीं चाहती है। इसके भी कई कारण हो सकते हैं : -

      १. सरकार बिहार के गरीब बच्चों की शिक्षा के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील नहीं है।
   २. सरकार यह नहीं चाहती है कि बिहार के गरीब बच्चे उच्च कोटि की शिक्षा प्राप्त कर प्राइवेट विद्यालय में पड़े पूंजीपतियों, अफसरों, और नेताओं के बच्चे से कदमताल कर सकें।
   ३. अधिकांश राजनेताओं के मनो - मस्तिष्क में यह बात भी हो सकती है कि शिक्षकों को अपने निजी परेशानियों में इतना उलझा कर रखा जाए कि वह समाज को जागरूक और शिक्षित नहीं बना सके, जिससे इस लोकतांत्रिक पद्धति में उन्हें बार-बार चयनित होने के लिए बहुत ज्यादा परेशानियों का सामना नहीं करना पड़े।
     ४. शिक्षा में गुणात्मक सुधार कई समस्याओं का एक ठोस निराकरण है। शिक्षा न सिर्फ अपने अधिकारों और कर्तव्यों का बोध कराता है बल्कि भिन्न प्रकार के आंदोलन के लिए भी शिक्षा जनता को प्रेरित करता है। शायद अधिकांश राजनेता को यह पसंद नहीं है कि बिहार की आम जनता इतना जागरूक और शिक्षित हो जाए कि गलत सही नीतियों के विरोध में आंदोलन को उतारू हो जाए। इसलिए सोची समझी रणनीति के तहत शिक्षकों को उलझा कर रखा जा रहा है और *इसी का फायदा उठाकर हम शिक्षकों में कुछ लोग नेतागिरी के लाइन में नित्य नए मुकाम हासिल कर रहे हैं जिनका भी आख़री मकसद है सत्ता सुख प्राप्त करना....*

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

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