२. 😴😴 अल्प वेतन साधारण जीवन खौफ के साए में कैसे संभव उच्च विचार सम्मानित व्यवहार 😴😴

शिक्षा का पतन - २

😴😴 अल्प वेतन साधारण जीवन खौफ के साए में कैसे संभव उच्च विचार सम्मानित व्यवहार 😴😴

आजाद के बाद भारत में लगातार साक्षरता की दर बढ़ी है। शिक्षा जगत में प्रतिस्पर्धा का दौर भी बढ़ा है। अधिकांश भारतीयों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाने की जद्दोजहद चरम पर है। शिक्षा के महत्व के प्रति जन जागृति निश्चित रूप से देश का महत्वपूर्ण बौद्धिक विकास है। आम जनमानस के इसी मानसिकता ने संपूर्ण राष्ट्र में शिक्षा का बाजारीकरण कर दिया है और बड़े शहरों से लेकर गांव कस्बे की गलियों में टाई बेल्ट वाले अंग्रेजी माध्यम के प्राइवेट स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और प्राइवेट विश्वविद्यालयों की देश में बाढ़ सी आ गई है। इसने उच्च शिक्षा प्राप्त दक्ष शिक्षकों का न सिर्फ समाज में मान सम्मान बढ़ाया है बल्कि ऐसे शिक्षक की मोटी कमाई का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है। शिक्षा के महत्व से परिचित राष्ट्र और समाज में भी न जाने क्यों सरकारी विद्यालयों के नियोजित शिक्षक हीन भावना और कुंठा के शिकार हैं और कोई भी इसकी गहराई में जाकर समाधान को प्रयासरत नहीं दिख रहा है। सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष पर पदस्थापित हमारे कुछ बुद्धिजीवी शख्सियतों का यह अनोखा तर्क होता है कि अल्प वेतन और न्यूनतम सुविधाओं के बीच प्राइवेट विद्यालयों का शैक्षणिक स्तर सरकारी विद्यालयों से काफी बेहतर है। इस तर्क के पीछे उनका क्या आधार होता है और उन्हें समाज के गरीब वर्ग के बच्चों की शिक्षा की कितनी चिंता होती है, इसका आकलन अत्यंत दुष्कर कार्य है...

१. सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि स्तरीय प्राइवेट स्कूल जैसे डीपीएस, डीएवी, नोट्रेडेम, गोथल्स, डॉन बॉस्को आदि में जॉइनिंग के साथ ही शिक्षकों को उचित मानदेय प्राप्त होता है और दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात कि मेधावी और मेहनती शिक्षकों को प्रोन्नति के अवसर भी प्राप्त होते हैं।

२. मध्यम श्रेणी के प्राइवेट विद्यालय में अधिकांश ऐसे युवा शिक्षण का कार्य करते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं होती है। ऐसे शिक्षक के रूप में कार्य करने का मुख्य मकसद अपनी पढ़ाई का खर्च निकालकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर बेहतर जॉब को हासिल करना होता है। कुछ युवा अपनी मार्केटिंग के लिए ऐसे विद्यालय में शिक्षण का कार्य करते हैं कि जैसे ही बच्चों और अभिभावकों के बीच वह लोकप्रिय हो जाएंगे तो अपना निजी कोचिंग संस्थान खोल कर अपार कमाई के मार्ग को सुनिश्चित कर सकें।

३. तृतीय श्रेणी में ऐसे युवा होते हैं जिनके पास आय का कोई भी विशेष स्रोत या साधन उपलब्ध नहीं होता है। *अपना और अपने परिवारजनों का अस्तित्व बचाए रखने के लिए और उनकी पेट की आग को बुझाने के लिए शोषण की पराकाष्ठा के बीच 3000 से 20000 के मामूली वेतन में यह लोग शिक्षण कार्य करते हैं। दरअसल इस राष्ट्र में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपना पेट पालने के लिए भीख मांगते हैं अथवा कई प्रकार के अपराधिक कार्यों में भी सम्मिलित हैं।* एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में किसी भी प्रोफेशनल का मानदेय उसकी योग्यता और उसके कार्य की प्रकृति के आधार पर निर्धारित होता है। अगर प्राइवेट और निजी उद्यमी ऐसे प्रोफेशनल्स का शोषण कर रहे हो तो उसे आधार बनाकर यह तर्क नहीं दिया जा सकता है कि प्राइवेट सेक्टर में इससे भी कम वेतन पर लोग यह कार्य कर रहे हैं। सरकारी विद्यालय के नियमित शिक्षकों को दी जीने वाली वेतन और सुविधाएं भी किसी लोकतांत्रिक सरकार द्वारा ही प्रदान की गई है।

४. सामान्य कार्य के लिए समान वेतन की मांग को कुछ लोग इस आधार पर भी गलत साबित करने का प्रयास करते हैं कि इनका चयन स्थानीय त्रिस्तरीय पंचायती राज सरकारों के द्वारा किया गया है। अतः यह लोग शिक्षकों के वाजिब अहर्ता को पूर्ण नहीं करते हैं। देश के भविष्य और गरीब बच्चों की शिक्षा से संबंधित इतने महत्वपूर्ण विषय पर सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा इतना गैर जिम्मेदाराना रवैया किसी भी दृष्टिकोण से उचित प्रतीत नहीं होता है। अगर किसी गलती के कारण कुछ कम योग्य लोग शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक के पद पर पदस्थापित हो गए हैं तो यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि उन्हें ससमय उचित प्रशिक्षण देकर दक्ष शिक्षक बनाया जाए और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मार्ग को प्रशस्त किया जाए। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को परोक्ष रूप में साधने के खयाल से किसी के वाजिब हक की हकमारी किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। देश के उच्च न्यायालय ने भी सामान्य कार्य का समान अधिकार को समय-समय पर अपने न्यायादेश से प्रतिष्ठित किया है।
५. इस देश में हमारे कुछ बुद्धिजीवी एवं शीर्ष नेतृत्व अक्सर धन के अभाव के कारण भी शिक्षकों को उचित मानदेय देने में अपनी असमर्थता जाहिर करते हैं। एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय के लिए अगर धन के अभाव को कारण बनाया जाता हो, ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि 21वीं सदी में जब हमारा राष्ट्र विकसित राष्ट्र के कतार में स्वयं को खड़ा करने हेतु प्रतिबद्ध है, ऐसे राष्ट्र में शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने हेतु हमारे पास धन का अभाव होना गंभीर चिंता का विषय है।

वर्तमान समय में बिहार सहित देश के अन्य राज्यों में नियोजित शिक्षकों एवं पारा शिक्षकों को जो मानदेय अथवा वेतन उपलब्ध करवाया जाता है, उनके पद और योग्यता एवं कार्य की प्रकृति को देखते हुए किसी भी दृष्टिकोण से उचित प्रतीत नहीं होता है। क्या हम आज उस स्थिति में आ गए हैं जहां देश के भविष्य को ऐसे शिक्षकों के भरोसे छोड़ दिया जाए जिनका स्वयं का भविष्य उन्हें अंधकार में महसूस हो रहा हो। नियोजित एवं पारा शिक्षकों का लगातार आंदोलित होना निश्चित रूप से उनके कार्य की गुणवत्ता को प्रभावित करता है जिससे बच्चों की शिक्षा पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। अधिकांश शिक्षक किसी लाचारी अथवा बेहतर विकल्प के अभाव में इस कार्य से जुड़े हुए हैं। इसी कारण उन्हें शिक्षण कार्य में कोई विशेष रूचि नहीं होती है। गैर शैक्षणिक कार्यों का दबाव और हर समय कार्रवाई के खौफ के साए के बीच कार्य करने का माहौल शिक्षकों के रचनात्मक कार्य को काफी प्रभावित कर रहा है। *हमारे राष्ट्र की नीति - निर्धारकों को यह समझना होगा की शिक्षा और शिक्षादान सभ्यता के प्रारंभ से अत्यंत सम्मानित कार्य रहा है और बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए कार्रवाई के कोड़े की जगह सम्मानित और प्रोत्साहित करने की नीति शिक्षा और गरीब बच्चों के स्वर्णिम भविष्य के निर्माण में सहायक हो सकता है।*

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

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