४. 🤬🤬। परीक्षा मुक्त शिक्षण संस्कृति ने किया बच्चों को सरस्वती की साधना से विमुख। 🤗🤗

शिक्षा का पतन - ४

🤬🤬। परीक्षा मुक्त शिक्षण संस्कृति ने किया बच्चों को सरस्वती की साधना से विमुख। 🤗🤗

शैक्षिक सत्र के अंत में आयोजित होने वाली वार्षिक परीक्षा का समय था। विद्यालय में सामान्य दिनों की अपेक्षा छात्रों की उपस्थिति कुछ ज्यादा ही थी। विद्यालय के सातवीं कक्षा में छात्र और विशेष रूप से छात्राएं कुछ ज्यादा शोरगुल कर रही थी। प्रधानाध्यापक महोदय जो उम्र में काफी बुजुर्ग थे, प्रश्न पत्र लेकर कक्षा में पहुंचे। बच्चों को समझाते हुए उन्होंने कहा इस तरीके से तुम लोगों को शोरगुल नहीं करना चाहिए। तुम लोग इस विद्यालय के वरिष्ठ छात्र हो। सभी लोग अपने स्थान पर बैठ जाओ और शांति पूर्वक लिखो। *तभी बच्चों की भीड़ से एक चीखती हुई आवाज आई "नहीं लिखेंगे सर, क्या किसी का हिम्मत है कि फेल कर देगा ?? जाइए हम नहीं लिखेंगे...," किशोर उम्र की एक छोटी बच्ची के मुंह से निकले यह शब्द परीक्षा मुक्त शिक्षण संस्कृति पर जोरदार तमाचा है। दरअसल धनवान लोग अपने बच्चे को अपने धन और प्रभाव का उपयोग करते हुए कई प्रकार की उच्च डिग्रियां दिलवाने में सफल हो जाते हैं, जबकि उन्हें भी पता होता है कि उनके बच्चे उन डिग्रियों के योग्य योग्यता नहीं रखते हैं। बाहुबली प्रकृति के लोग अपने बाहुबल का उपयोग करते हुए परीक्षा में कदाचार को बढ़ावा देते हैं। इस प्रकार परीक्षा अपने मूल को प्राप्त करने से वंचित हो जाता है। दुर्भाग्य से हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने एक ऐसी संस्कृति और माहौल का निर्माण किया है जहां बच्चों के मन से परीक्षा का भय बिल्कुल ही समाप्त हो चुका है।* इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसी भय के कारण कितने ही बच्चे आत्महत्या करने को विवश हुए हैं लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि परीक्षा रूपी आग में तप कर ही हमें कोयला से कुंदन प्राप्त होता है। *अपने ही बच्चों को वार्षिक परीक्षा के उपरांत असफल घोषित करना किसी भी शिक्षक को अच्छा नहीं लगता है लेकिन अयोग्य बच्चों को सफल घोषित करना उससे भी ज्यादा शर्मनाक है।* शिक्षक समाज का वह मजबूत स्तंभ है जो नई पीढ़ी का निर्माण करता है। बच्चों को अच्छे गुणों से संस्कारित करता है। उसकी प्रतिभा को निखारने में एक मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वहन करता है। गलत प्रवृत्तियों में लिप्त होने पर बच्चों को दंडित कर उसे सही मार्ग पर लाने का प्रयास करता है। शिक्षक बच्चों के व्यवहार और विचार को समाज और राष्ट्र के रचनात्मक कार्यों के लायक बनाने हेतु निरंतर प्रयासरत रहता है।
           
                  सत्र के अंत में होने वाली परीक्षा में शिक्षक सिर्फ बच्चों की परीक्षा नहीं लेता है बल्कि अपने प्रयास का भी मूल्यांकन करता है। ऐसे में बहुत सारे छात्र ऐसे होते हैं जो एक निश्चित मानक को प्राप्त करने में असफल होते हैं लेकिन उन्हें सफल घोषित कर देना किसी भी दृष्टिकोण से उपयोगी साबित नहीं हो सकता है। *प्रारंभिक शिक्षा को परीक्षा मुक्त कर देने का नतीजा यह हुआ कि बहुत सारे छात्र जो परीक्षा के भय से भी सरस्वती की साधना में लिप्त हो जाते थे, अब उनकी परीक्षा और पठन-पाठन में विशेष रूचि नहीं रही।* इसका नतीजा यह निकला कि बच्चों में अपने कक्षा के स्तर का न्यूनतम योग्यता का भी विकास नहीं हो पाया। जिसके दुष्परिणाम स्वरूप ऐसे बच्चे अगली कक्षा के पाठ्यक्रम को समझने के योग्य नहीं बन पाये। फलस्वरूप सरकारी विद्यालय के बच्चों के औसत मेधा के स्तर में निरंतर ह्रास हुआ। इसके साथ ही माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में भी कम योग्य छात्र पहुंचने लगे। बौद्धिक और मानसिक रूप से कम योग्य इन छात्रों को पढ़ाने में माध्यमिक उच्च माध्यमिक शिक्षकों की भी कोई विशेष रूचि नहीं रह गई। *धीरे धीरे सरकारी शिक्षा व्यवस्था डिग्री बांटने वाली एक संस्था बन कर रह गई।* कालांतर में जिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक सरकारी विद्यालयों में प्रवेश के लिए उच्च स्तर के प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन किया जाता था, आज उनकी गरिमा और प्रतिष्ठा धूमिल होकर रह गई है।
       
               इस बीच तुलनात्मक रूप से कम योग्य और कम योग्यता धारी शिक्षकों के कोचिंग संस्थानों और ट्यूशन देने वालों का कुकुरमुत्तों की तरह एक फौज तैयार हो गया है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह एक कड़वी सच्चाई है कि बिना ट्यूशन और कोचिंग के कोई भी छात्र माध्यमिक स्तर की बोर्ड परीक्षा भी पास नहीं कर पाता है। परीक्षा मुक्त शिक्षण संस्कृति में धीरे धीरे सरकारी शिक्षण पद्धति को खोखला कर दिया। *अभिभावकों और समाज के बुद्धिजीवी वर्ग में यह मानसिकता घर कर गई कि सरकारी विद्यालय के शिक्षक पठन-पाठन कार्य के योग्य नहीं है।* हमारे देश की सरकार ने लगातार शिक्षा के उत्थान के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। गरीब बच्चों के लिए लोकलुभावन योजनाओं के तहत मध्याह्न भोजन, मुफ्त छात्रवृत्ति एवं पोशाक, मुफ्त किताब, लड़कियों के लिए साइकिल आदि जैसी कई उपयोगी योजनाएं चलाकर प्रारंभिक से उच्च माध्यमिक विद्यालय में बच्चों के प्रवेश और उपस्थिति को बढ़ाने में सरकार सफल हो गई, लेकिन शिक्षा अपने मुल ध्येय को प्राप्त करने से वंचित रह गया। शिक्षा की गुणवत्ता का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनोधारी बनाने के लिए वचनबद्ध द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरु दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया था। *दरअसल शिक्षा दुनिया का वह सर्वश्रेष्ठ और अमूल्य संपत्ति है जो लाखों बगुलों के भीड़ में हंस को अलग और सर्वश्रेष्ठ दिखलाने में सफल होता है।* हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति और सरकार ने हंसों की फौज तैयार करने के उद्देश्य से उस बुनियादी पद्धति को ही नष्ट कर दिया है जिसके द्वारा लाखों की भीड़ से भी हंस चुनकर आते थे और असफल बगुले हंस बनने के लिए नई ऊर्जा और नई प्रेरणा के साथ प्रयासरत हो जाते थे।

        बेशक मेरी बातों से बहुत सारे बुद्धिजीवी इत्तेफाक नहीं रखते होंगे लेकिन ऐसे बुद्धिजीवियों से मेरा यह सवाल है कि *अगर परीक्षा का महत्व नहीं है अथवा परीक्षा इतना ही भयभीत और विनाशकारी है तो परीक्षा को सिर्फ प्रारंभिक और बुनियादी स्तर पर ही क्यों समाप्त किया गया ? काल क्रम के साथ उच्च शिक्षा और प्रतियोगिता परीक्षा का स्तर  दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है, लेकिन वहीं प्रारंभिक स्तर पर परीक्षा को महत्वहीन क्यों  बना दिया गया है।* महंगे और निजी विद्यालयों में प्रारंभिक स्तर पर भी प्रवेश हेतु कम उम्र के बच्चों को प्रवेश परीक्षा के दौर से गुजरना होता है लेकिन सरकारी विद्यालयों में सत्रांत होने वाली परीक्षा में उपस्थिति मात्र से बच्चों को सफल कर देने की गैर वाजिब परंपरा ने न सिर्फ शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित किया है बल्कि बच्चों को परीक्षा के महत्त्व से अनजान बना कर मानसिक दिवालियापन का शिकार बना दिया है। यही बच्चे जब व्यस्क होकर सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में नौकरी के लिए आवेदन देते हैं तो इन्हें अचानक से एक कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना होता है। *जीवन के प्रारंभिक दौर में परीक्षा के बुनियादी मतों से अनभिज्ञ रह जाने वाले बच्चे जब प्राइवेट संस्थानों के दक्ष प्रतिभागियों से प्रतिस्पर्धा करते हैं तो छोटी मोटी असफलता भी उन्हें आत्मग्लानि और डिप्रेशन का शिकार बना देता है।* यही कारण है कि वर्तमान समय में सामर्थ्य नहीं रहने पर भी लोग अपने चल अचल संपत्ति को बेच कर भी बच्चों को निजी संस्थानों में शिक्षा दिलवाना बेहतर समझते हैं। सरकारी विद्यालय के शिक्षकों और शिक्षण पद्धति पर उंगली उठाने वाले लोगों से हमारा अनुरोध है कि आप एक आंदोलन ऐसा करें कि हमारे सारे सभी जनप्रतिनिधि एवं राजनेता और सरकारी विद्यालयों के लिए नीति निर्धारण करने वाले पदाधिकारी एवं उच्च अधिकारी के बच्चे भी सरकारी विद्यालयों में ही अपने बच्चों को शिक्षा दिलवाने के लिए मजबूर हो जाएं। *यकीन मानिए अगर अपने बच्चों का भविष्य बनाने की बात किसी के समक्ष आएगी तो वह निश्चित रूप से एक ऐसी शिक्षा नीति का निर्माण करेगा जो वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी युग के परिप्रेक्ष्य में सर्वश्रेष्ठ होगा। राजनेताओं और उच्च अधिकारियों के बच्चों का सरकारी विद्यालय और शैक्षणिक संस्थानों पर निर्भरता मात्र से शिक्षा जगत में बदलाव की एक ऐसी बयार चलेगी, जहां सभी गलत नीतियां और परंपरा स्वत: समाप्त हो जाएगा।* सरकारी शैक्षणिक संस्थान अपनी पुरानी प्रतिष्ठा को प्राप्त करने में एक बार सफल हो सकता है और यह भारत को पुनः जगतगुरु बनाने का मार्ग सशक्त और सुदृढ़ कर सकता है।

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