३.🚶🏼‍♀🏃🏻‍♀🏃🏿 पलायनवादी प्रवृत्ति ने किया शिक्षा का बेड़ा गर्क 🚶🏼‍♀🏃🏻‍♀🏃🏿

*शिक्षा का पतन - ३*

🚶🏼‍♀🏃🏻‍♀🏃🏿 पलायनवादी प्रवृत्ति ने किया शिक्षा का बेड़ा गर्क 🚶🏼‍♀🏃🏻‍♀🏃🏿

यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि देश का नेतृत्व आज पलायनवादी प्रवृत्ति के लोगों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। पलायन वादी प्रवृत्ति के लोग किसी समस्या की गहराई में जाकर उसका मंथन और निराकरण करने की जगह वहां से पलायन करना अथवा आक्षेप लगाकर स्वयं को जिम्मेदारी से मुक्त करना बेहतर समझते हैं। इसी का परिणाम है कि आज हम दावे के साथ नहीं कह सकते हैं कि आने वाले समय में हमारे कौन से राजनेता किस पार्टी में रहेंगे अथवा कौन सा गठबंधन भविष्य में कायम रहेगा अथवा कौन सा कार्यकर्ता आने वाले समय में किस पार्टी का झंडा ढोएगा। विचारधारा और नैतिक पतन की बुनियाद पर सत्ता और कुर्सी तो प्राप्त की जा सकती है लेकिन देश और समाज की समस्याओं का गहराई से मंथन और निराकरण शायद ही संभव है। *आज छोटी मोटी बातों पर लोगों को देश छोड़ने की सलाह दे दी जाती है। सवाल पूछने पर उन्हें देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है। फिर शिक्षा और शिक्षक समाज इससे कैसे अछूता रह सकता है। अपनी समस्याओं और मांगों को रखने पर कई राजनेता उन्हें नौकरी छोड़ने की सलाह भी दे देते हैं, लेकिन असल सवाल और मुद्दा वही खड़ा रहता है कि क्या नियोजित शिक्षकों के नौकरी को छोड़ देने से शिक्षा और शिक्षकों की समस्या समाप्त हो जाएगी।* सम्मान के सर्वोच्च शिखर   पर पदासीन लोग कभी भी इस सवाल का जवाब नहीं देते हैं कि उन्होंने कोई पार्टी क्यों छोड़ा और एक दूसरी पार्टी या गठबंधन को क्यों ज्वाइन किया ? यह लोग यह बताना भी उचित नहीं समझते हैं कि नई पार्टी को ज्वाइन करने से जनता, देश और समाज को क्या हासिल हुआ ?? "जैसा उनके पूर्व के गठबंधन और पार्टी में संभव नहीं था।" समस्याओं, सवालों और चुनौतियों से मुंह छुपाने वाले लोग अपने फायदे के लिए उलुल - जुलूल तर्क गढ़ते रहते हैं। शिक्षा के लगातार राजनीतिकरण की प्रवृत्ति ने न सिर्फ शिक्षा की गुणवत्ता और इसके उद्देश्य को गलत तरीके से प्रभावित किया है बल्कि यह अपने वाजिब दिशा से ही विमुख होकर धनार्जन का एक माध्यम बनकर रह गया है। यही कारण है कि आज पढ़े लिखे लोगों में नैतिकता का पतन चरम पर है। कलर्क और छोटे स्तर के कर्मचारियों का नैतिक पतन समाज को ज्यादा प्रभावित नहीं करता है, लेकिन अगर चिकित्सक, वकील, शिक्षक और बड़े स्तर के पदाधिकारियों मे भी नैतिक पतन चरम पर हो तो यह राष्ट्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इस प्रकार की समस्याओं को किसी भी नियम और कानून के बल पर समाप्त नहीं किया जा सकता है। इसके लिए राष्ट्रवाद और देश प्रेम की भावना के साथ-साथ अपने समाज और देशवासियों के सेवा की भावना से ओतप्रोत उच्च शिक्षा ही एकमात्र ठोस उपाय हो सकता है। अगर हम प्रारंभिक शिक्षा को ही भगवान भरोसे छोड़ देंगे और उनके शिक्षकों को नौकरी छोड़ने का उपदेश देंगे तो ऐसे में यह समस्या समाप्त होने की जगह काफी विकराल हो जाएगा, जिससे हमारी देश की अखंडता और एकता प्रभावित होगी और यह संपूर्ण राष्ट्र के लिए आत्मघाती साबित होगा।

शिक्षा और चिकित्सा ऐसे क्षेत्र हैं जहां धनार्जन से ज्यादा महत्वपूर्ण लोगों की सेवा और आत्मसंतुष्टि होता है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ समय में शिक्षक और चिकित्सक के पद पर भी नियोजित और ठेके पर बहाली की परंपरा शुरू की गई है। इस प्रकार की बहाली से तात्कालिक रुप में देश के कुछ धन की बचत भले ही संभव हो लेकिन जब यह लोग लगातार आंदोलन और विरोध की मुद्रा में आ जाएंगे तो निश्चित रूप से उनके कार्य की गुणवत्ता प्रभावित होगी। शिक्षा और चिकित्सा का निजीकरण किसी भी स्तर पर भारत जैसे विकासशील और पिछड़े राष्ट्र के लिए लाभदायक और उपयोगी साबित नहीं हो सकता है। हमारे देश के नीति नियंताओं और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को इनके दूरगामी और गंभीर परिणामों पर यथाशीघ्र मंथन कर इसके ठोस समाधान की पहल करना अत्यंत आवश्यक है। *धनवान लोगों के महंगे निजी विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चों से हम निशुल्क और समर्पित सेवा की अपेक्षा नहीं रख सकते हैं। दरअसल ऐसे लोग जिन्होंने समस्याओं को अपने स्वयं के स्तर पर नहीं झेला है वह समस्या ग्रस्त लोगों से नहीं सहानुभूति रख सकता है और नहीं उनकी समस्याओं के समाधान में खुद को समर्पित कर सकता है।* उदाहरण स्वरूप हमारे देश में राष्ट्रपिता का सम्मान प्राप्त महात्मा गांधी को जब साउथ अफ्रीका में फर्स्ट क्लास ट्रेन की बोगी से उतारा गया था, तभी उन्होंने अफ्रीका से काले - गोरे के भेदभाव को समाप्त करने का प्रण लिया और आज उनका यह प्रण इतिहास के पन्नों में सुनहरे शब्दों में अंकित है। हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति और सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की उपेक्षा के कारण पढ़े लिखे लोगों की एक ऐसी नई फौज तैयार हो रही है जिसका नैतिकता और सेवा से कोई सरोकार नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उन्होंने उच्च - शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने परिवार का बहुत सारा धन खर्च किया है और ऐसे युवाओं के शिक्षा प्राप्ति का सर्वप्रथम उद्देश्य अपने परिवार द्वारा शिक्षा पर किए गए खर्च को लाभ सहित अर्जित करना होता है। पिछले कुछ समय से प्रारंभिक शिक्षा के साथ-साथ माध्यमिक और उच्च शिक्षा में भी निजी क्षेत्र का बोलबाला बढ़ा है। एक अरब से ज्यादा की आबादी वाले हमारे देश में आज भी उन लोगों की संख्या ज्यादा है जो किसी प्रकार अपना जीवन यापन करते हैं और मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा जद्दोजहद होता है। ऐसे में अगर निजी क्षेत्र का शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में लगातार दबदबा बढ़ेगा तो गरीब परिवारों में मौजूद प्रतिभाशाली बच्चों को आगे बढ़ने का उचित अवसर प्राप्त नहीं हो पाएगा। यह गरीब बच्चों के मेधा के साथ अन्याय होगा। अमीर और मेधावी बच्चे जब उच्च शिक्षा प्राप्त कर राष्ट्र के अधिकांश पदों को सुशोभित करेंगे, ऐसे में गरीबों और वंचितों के सेवा की उन लोगों से बहुत ज्यादा अपेक्षा नहीं की जा सकती है। वर्तमान समय में नियोजित शिक्षक भी अपने बच्चों को निजी क्षेत्रों की महंगी शिक्षा दिलवा पानी में खुद को असमर्थ महसूस कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें स्वयं और अपने बच्चों का भविष्य अंधकार में दिख रहा है। शिक्षक बुद्धिजीवियों का जमात है और इन्हें सरकार अल्प वेतन देकर इन परिवारों के प्रतिभाशाली बच्चों को महंगी उच्च शिक्षा से वंचित कर दे रही है। प्रारंभिक विद्यालयों के शिक्षकों के लगातार आंदोलनरत रहने का यह भी एक बहुत बड़ा कारण है।

शिक्षकों को कम वेतन देने के संबंध में एक ठोस तर्क यह भी दिया जाता है कि यह लोग परीक्षा पास करें तभी उन्हें उचित वेतन दिया जाना संभव हो पाएगा। मुझे इस बात से कहीं कोई एतराज भी नहीं महसूस होता है लेकिन इसके पीछे के व्यवहारिक बातों पर भी हमारे देश के नीति नियंताओं को बारीकी से मंथन करना चाहिए। *क्या हमारे देश में जितने भी आईएएस आईपीएस और शीर्ष पद पर आसीन पदाधिकारी हैं, उन्हें अगर अपनी सेवा के दस या बारह वर्ष बाद पुनः आज  एस एस सी, बी पी एस सी, और यूपीएससी की परीक्षा में बैठकर अपनी योग्यता साबित करने के लिए कहा जाए तो क्या वह ऐसा कर पाएंगे और अगर कर पाएंगे तो ऐसे लोगों का प्रतिशत क्या होगा ??* बैंक में एक व्यक्ति चपरासी के पद पर नियुक्त होकर विभागीय परीक्षा और अनुभव के आधार पर शाखा प्रबंधक के पद पर नियुक्त हो जाता है। देश की सबसे बड़ी नियोक्ता रेलवे में ट्रैकमैन और गैंगमैन के पद पर नियुक्त व्यक्ति विभागीय परीक्षा के माध्यम से स्टेशन अधीक्षक के पद को भी सुशोभित करता हुआ देखा गया है, लेकिन शिक्षा जगत के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति शिक्षकों को अपने वाजिब मांगों को मनवाने के लिए लगातार यह तर्क देना कि इन्हें वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रतियोगिता परीक्षा के स्तर की परीक्षा पास करनी होगी, किसी भी दृष्टिकोण से तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है। ऐसे में अयोग्य और अकुशल व्यक्ति को शिक्षक बनाए रखना भी किसी भी दृष्टिकोण से उचित प्रतीत नहीं होता है। सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों को चिन्हित कर इनके स्तर के कार्यों में इनका समायोजन कर दें और योग्य एवं कुशल शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन देकर प्रारंभिक शिक्षा को मजबूत और सकारात्मक दिशा प्रदान करने में एक ठोस पहल करें। *प्रारंभिक शिक्षा देश की वह बुनियाद है जिसकी बदौलत राष्ट्र का स्वर्णिम भविष्य नई ऊंचाइयों को प्राप्त करने में सक्षम हो सकता है। इसकी उपेक्षा और दिशाहीनता का संपूर्ण राष्ट्र को गंभीर परिणाम चुकाना पड़ सकता है। अतः यह आवश्यक है कि इस समस्या के समाधान हेतु समय रहते ठोस निर्णय लिया जाए।*

✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी*

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