शिक्षा का पतन - ५
*शिक्षा का पतन - ५*
*विडंबना*
✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी*
कितना अजीब है, डोर टू डोर शिक्षा का होम डिलीवरी करने वाले ट्यूशनिया मास्टर से लेकर मेगा मार्ट वाला शिक्षा का विशालकाय शो रूम चलाने वाले लोग, स्वर्णिम भविष्य वाला मुंगेरी लाल का हसीन सपना दिखाने के दौरान, अपने तरह तरह के ऑफर और सस्ता सुविधाजनक लुभावना पैकेज दिखा दिखा कर आज मिडिल क्लास परिवार से कड़ोरों रुपया वसूल रहे हैं लेकिन अगर वास्तव में सर्वे करवाया जाय तो सबसे क्रूरतम सत्य यही है कि अंततोगत्वा 90% से ज्यादा अभिभावक और बच्चे स्वयं को ठगा महसूस करते हैं। *इस दौरान एक कॉमन बात जो निकल कर आता है कि यह लोग बिसलरी का ठंडा पानी पी पी कर सरकारी शिक्षा व्यवस्था और सरकारी शिक्षकों को जी खोल कर कोसते हैं।* मैंने पांच वर्षों तक प्राइवेट विद्यालय का सफलतापूर्वक संचालन किया है और बरारी प्रखंड में बच्चों को आने जाने के लिए वाहन का सुविधा उपलब्ध कराने वाला संभवतः पहला विद्यालय संचालक रहा हूं। पिछले छह वर्षों से सरकारी शिक्षक के रूप में भी अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा हूं लेकिन इस दौरान जो मूल अंतर पाया वह कुछ इस प्रकार हैं -
१) निजी विद्यालय और ट्यूशनिया मास्टर के पास अभिभावक अपने बच्चों के स्वर्णिम भविष्य के लिए आते हैं और बच्चों का एटिट्यूड विद्यार्थी वाला होता है। प्राइवेट विद्यालय और ट्यूशनिया मास्टर के लिए प्रत्येक छात्र एक कस्टमर होता है और उसके पेकेट के स्ट्रेंथ के हिसाब से उन्हें सेवा और सुविधाएं उपलब्ध कराने का भरपूर प्रयास किया जाता है। *पेकेट का स्ट्रेंथ समाप्त, सेवा और सुविधाएं भी समाप्त।*
२) सरकारी विद्यालय में अभिभावक और बच्चे लाभार्थी बन कर आते हैं। लाभ प्राप्त करना उनका अधिकार होता है और किसी कारणवश लाभ से वंचित होते ही गुरु शिष्य परंपरा और सभ्यता संस्कृति के सभी मापदंड ताड़ ताड़ हो जाते हैं। सरकार द्वारा घोषित शिक्षा नीति के कुछ विशेष नीतियां भी इस अव्यवस्था का खूब पोषण करते हैं...। जैसे....
👉🏻 बच्चों को किसी प्रकार का दण्ड नहीं देना है, चाहे बच्चा कितना भी उद्दंड अथवा अपने कर्तवयों से विमुख हो जाए जबकि प्राइवेट विद्यालय में ऐसे बच्चों को आर्थिक दंड के साथ साथ विद्यालय से निकालने का मार्ग खुला रहता है।
👉🏻 बच्चों को फ़ैल नहीं करना है जबकि प्राइवेट विद्यालय में बच्चों को वार्षिक तो छोड़ दीजिए, त्रैमासिक, मासिक और साप्ताहिक परीक्षा में भी उत्तीर्ण करना आवश्यक होता है। इसके लिए शिक्षा का होम डिलीवरी करने वाले विद्वानों के साथ साथ माता पिता भी अपने छात्र जीवन से ज्यादा ताकत झोंक देते हैं।
३) प्राइवेट विद्यालय में सुविधा संपन्न बच्चों को पढ़ाना होता है जबकि सरकारी विद्यालयों में हमारे समक्ष बच्चों की एक ऐसी फौज होती है, जिसमें अधिकांश बच्चे बेसिक संसाधनों से भी वंचित होते हैं।
४) प्राइवेट विद्यालय के बच्चों के शैक्षणिक विकास पर अभिभावकों की बहुत पैनी निगरानी होती है जबकि सरकारी विद्यालयों के बच्चों से अधिकांश अभिभावक घर पर घरेलू, कृषि और पालतू पशुओं के देखभाल का कार्य भी लेते हैं।
५) प्राइवेट विद्यालय के कलास रूम का माहौल अत्यंत प्रतिस्पर्धात्मक होता है जबकि सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों के पढ़ाने के दौरान माहौल अत्यंत बोझिल और कई बार घुटन भरा होता है।
*क्रमशः...*
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